सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

कश्मकश - कवीन्द्र रवीन्द्र की नौकाडूबी पर आधारित हिन्दी फ़िल्म

जीवन कितना जटिल हो सकता है, इसे रविन्द्रनाथ ठाकुर की कहानियों से बेहतर कौन दर्शा सकता है? उनकी कहानी "नौकाडूबी" पर आधारित उसी नाम की बांगला फ़िल्म का हिन्दी रूपांतरण है "कश्मकश"। संवाद सदा बना रहना चाहिये। लेकिन संवाद के साथ भी मौन चल सकता है क्या? और संवादहीनता? रहती ही है, हम कितना भी मुखर होना चाहें। समाज के नियम, जिनका उद्देश्य शायद समाज का भला ही रहा हो, कितनी बार कितने कष्टकर होते हैं। कानून की शिक्षा पूरी करने पर रमेश कोलकाता में नया घर ढूंढता है ताकि अपने सहपाठी की बहन हेमनलिनी से विवाह करके उसे उसकी पुस्तकों और वाद्ययंत्रों के साथ अपने घर ला सके।

पिता कानून की शिक्षा प्राप्त करके घर आये पुत्र को बताता है कि उसने उसका विवाह एक निर्धन परिवार की अशिक्षित कन्या सुशीला से तय कर दिया है। पिता-पुत्र में इस विषय पर होनेवाली वार्ता में तय होता है कि दोनों ही एक दूसरे को नहीं पहचाने। पिता पुत्र को उसकी मर्ज़ी से शादी करने जाने देता है परंतु प्रण करता है कि पुत्र से अपने सम्बन्ध तोड़कर भी उस कन्या को पुत्रवधू बनाकर अपने घर अवश्य लायेगा ताकि निर्धन परिवार का सम्मान बना रहे। इस तकरार को कन्या की बैठक में बैठी हुई विधवा माँ धैर्य से सुनती है। घर छोड़कर जाते भावी दामाद को बताती है कि उसे रोकेगी नहीं, पर अब माँ-बेटी के लिये आत्मोत्सर्ग करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं रहता है।

दो दिल टूटें या दो जानें जायें? रमेश विवाह की सम्मति देता है। विदा होकर लौटती हुई नौका तूफ़ान में फंस जाती है। तूफ़ान गुज़रने के बाद टूटी नौका के किनारे रमेश केवल एक ही व्यक्ति को जीवित पाता है। नव-विवाहिता को सहारा देकर कोलकाता आता है और अपने नये घर को पत्नी की रुचि व आवश्यकता के अनुसार सजाना आरम्भ करता है।

"यह तो अजीब बात है, कभी कहते हो सुशीला और अब हेम, मैं कमला, आपकी इस्त्री।"

"ग़लती से सच बात कह दी थी। मैं इस्त्री ही हूँ। मेरे छूने से आपको झटका लग जाता है।"

रमेश को पता लगता है कि यह स्त्री कमला उसकी विवाहिता सुशीला नहीं है। निश्चित हो जाता है कि रमेश के पिता और पत्नी दोनों ही उस दुर्घटना में स्वर्गवासी हुए हैं। कमला को हॉस्टल भेजकर रमेश समाचार-पत्र में उसकी कुशलता का विज्ञापन अपने पते के साथ छपवाता है। साथ ही अपनी प्रेमिका हेमनलिनी से मिलकर कुछ आवश्यक बातें बाद में बताने को कहकर विवाह के लिये कुछ दिन रुकने का आश्वासन लेता है।

"मैं आपसे एक बात कहूँ।"

"कहो।"

"मुझे पता है लड़कियों को पसन्द-नापसन्द करने का कोई हक़ नहीं। आप लेकिन मुझे बहुत पसन्द हो।"


कहानी कुछ इस प्रकार उलझती है कि हेमनलिनी से विवाह की बात झटककर रमेश को कमला के साथ कोलकाता छोड़कर काशी जाना पड़ता है।

"कुछ तो चाहिये होगा तुम्हें? बोलो क्या चाहिये।"

"आप मुझे कहीं और तो नहीं भेज देंगे।"

"नहीं भेजूंगा।"

एक दिन संयोग से कमला को उसी समाचार की प्रति मिल जाती है जिसमें उसकी गुमशुदगी का विज्ञापन छपा था। वह रमेश को पत्र लिखकर गृहत्याग करती है।

"एक दिन नदी में डूबने वाली थी, पता नहीं कैसे आपके चरणों में आ गयी ... अब उसी नदी में वापस जा रही हूँ।"

"इतनी सुन्दर पत्नी थी तुम्हारी। पति-पत्नी का रिश्ता भी तुमने नहीं निभाया, इसी दुःख में ..."

उधर हेमनलिनी का परिचय डॉ. नलिन से इतना गहराता है कि दोनों के विवाह की बात चलती है, मगर होनी को कुछ और ही मंज़ूर था।

"वापस आने के लिये चले जाना पड़ता है, वे चले नहीं गये थे।"

"चले नहीं गये थे, तो कहाँ गये थे?"

"वे खो गये थे, और हम सबने सोच लिया कि वो हमें छोड़कर चले गये और कोई खबर नहीं दी।"

हेमनलिनी को समझ आता है कि वह रमेश को छोड़कर किसी अन्य से विवाह नहीं कर सकती है। डॉ नलिन से शायद अपनी बात स्पष्ट न कह पाये सो एक पत्र में सब लिखकर उनकी माँ के लिये लेकर जाती है।

"नलिन की माँ हूँ, इसीलिये सोच लिया कि पढी-लिखी हूँ?"

"चोट को अपने दिल में कोई पालकर रखेगा, दर्द तो उसे सहना पड़ेगा। ... प्रतीक्षा ही मेरी ज़िन्दगी है, उम्मीद करती हूँ कि एक न एक दिन मेरी भी नाव किनारे लगेगी।"

नलिन अपनी माँ के दुःख को समझता है।

"रो मत माँ। माँ खाना दो भूख लगी है।"

"तुम्हें अपने खोये हुये पति की सौगन्ध, झूठ मत कहना।"


"भगवान जो करते हैं, अच्छे के लिये करते हैं"

"तुम्हें तो मालूम है मैं भगवान को नहीं मानता"

"आज अगर आपके पैर छूना चाहूँ तो आप मना तो नहीं करेंगे।"

"नहीं करूंगा करूंगा। तुम्हें बुखार है उठना मत। ... चाहो तो खत लिख सकती हो डरो मत ग़लतियाँ नहीं निकालूंगा


रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कथा "नौकाडूबी" पर आधारित इस फ़िल्म का निर्देशन रितुपर्णो घोष ने किया है, सुभाष घई के लिये। मुख्य भूमिकायें राइमा सेन (हेमनलिनी), रिया सेन (कमला), प्रसेनजित चटर्जी (डॉ. नलिन), और जिषु सेनगुप्ता (रमेश) ने निभाई हैं। कहानी की खूबसूरती यही है कि शिक्षित और निरक्षर, आस्तिक और नास्तिक, इसका हर चरित्र सुलझा हुआ और परिपक्व दिखता है। अपनी-अपनी चोटों को सहते हुए, ये सज्जन अपनी स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा करते हुए भी दूसरों को उनका समुचित देने को तैयार बैठे हैं।

संगीत: राजा नारायण देव व संजय दास का; गायन: श्रेया घोषाल, मधुश्री, सुदेष्णा चटर्जी, और हरिहरन; गीत गुलज़ार के हैं। सुखांत कहानी अपने सारे उतार चढ़ाव के बावजूद कहीं बोझिल होती नहीं लगती। मेरा सुझाव: अवश्य देखिये।

"आओ! ... जाओ उधर जाओ। वह राह देख रही है।"

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

अनुरनन - काव्य सरीखी फिल्म

राइमा सेन - अनुरनन में 
बंगला भाषा में अनुरनन का निकटतम अर्थ होगा अनुनाद या सुर-संगति। यदि शाब्दिक अर्थ से ऊपर उठकर देखें तो "मनभावन" शब्द भी बुरा न होगा। अनुरनन का आरम्भ यूरोप की हरीतिमा में किसी कोमल कविता की तरह होता है और उसका चरम होता है कंचनजंघा के अलौकिक दृश्यों के साथ। लगता ही नहीं जैसे कोई फिल्म देखी जा रही हो। यूँ महसूस होता है मानो अर्धनिद्रा में कोई स्वप्न कानों में चुपके से फुसफुसा गया हो।

मूल बांगला में बनी इस फिल्म का हिन्दी संस्करण भी उपलब्ध है, मैने वही देखा है। अनिरुद्ध राय चौधरी के निर्देशन में राइमा सेन, रितुपर्ण सेनगुप्ता, राहुल बोस, रजत कपूर जैसे कलाकारों ने प्रभावी अभिनय किया है। संगीत तन्मय बोस और आशीष रेगो का है। कलकत्ता में रहने वाला एक दम्पत्ति युगल नन्दिता (रितुपर्णो सेनगुप्ता) और राहुल चटर्जी (राहुल बोस) अपनी अजन्मी संतान को खोने के दुख और उससे उपजी समस्याओं का सामना करते हुए मुम्बई आ जाते हैं। व्यवसाय के सिलसिले में वे बर्मिंघम पहुंचते हैं।

राहुल बोस - अनुरनन से
कुछ समय बाद बाघडोगरा में प्रारम्भ होने वाले नये व्यवसाय के सिलसिले में राहुल की कम्पनी उसे भारत भेजती है। दोनों भारत आ जाते हैं जहाँ कलकत्ता में उनकी भेंट कम्पनी के भारतीय प्रतिनिधि अमित बनर्जी (रजत कपूर) और उसकी पत्नी प्रीति (राइमा सेन) से होती है। दोनों परिवारों की नज़दीकियाँ बढती हैं। जहाँ सम्वेदनशील नन्दिता और व्यवसायी अमित अपने-अपने संसार में रहते हैं, सृजनशील प्रीति और रचनात्मक राहुल अनजाने ही एक दूसरे के काफी निकट आते हैं और उनके बीच वह कोमल भावना उत्पन्न होती है जिसे फिल्म में अनुरनन का नाम दिया गया है।

भारत है, उनके अनुरनन के बारे में बातें तो उडती ही हैं। नन्दिता बच्चों की शाला में अध्यापन शुरू कर देती है। अमित काम के सिलसिले में यूरोप जा रहा होता है तब नन्दिता प्रीति को राहुल के सिक्किम जाने के बारे में बताती है। प्रीति अमित के साथ लंडन जाने की ज़िद करती है और हमेशा की तरह मना किये जाने पर कहती है कि अगले जन्म में वह उन्मुक्त पक्षी बनना चाहती है।

जाने के बाद जो देखा वह पहले क्यों नहीं दिखता?
दार्जीलिंग की पृष्ठभूमि में चल रहे आन्दोलन की छाया में बदली अपनी परियोजना के सिलसिले में अब राहुल सिक्किम में पहाड़ पर ऐसी जगह पर है जहाँ से कंचनजंघा दिखाई देती है। एक रात राहुल अपने कमरे से बाहर आकर हिमालय का अलौकिक दृश्य देखता है। परंतु वह अकेला नहीं है। उसके साथ है प्रीति जो किसी से कहे बिना कलकता से हिमालय देखने आयी है। दोनों साथ घूमते हैं, बातचीत करते हैं। गेस्ट हाउस के कर्मी उन्हें पति-पत्नी जैसे मान देते हैं। चान्दनी रात में रजतमय चोटी का अवलोकन करने से पहले प्रीति राहुल से कहती है, "ज़िन्दगी हमेशा बिट्रे करती है।" गुड नाइट कहकर राहुल अपने कमरे में कुछ कविता सी रिकॉर्ड करता है, "लोग क्यों एक दूसरे के करीब आते हैं ..."। सुबह उठकर कंचनजंघा पर सूर्योदय का दिव्य दृश्य देखकर उत्साहित प्रीति जब राहुल के कमरे में आती है तो पाती है कि रात में किसी समय उसकी आकस्मिक मृत्यु हो चुकी है। लंडन में पति की बात थाने में दुश्चरित्र समझकर बिठाई हुई पत्नी से होती है। बस यहीं से आरम्भ होती है प्रीति के चरित्र हनन, मानसिक यंत्रणा, पुलिस प्रक्रिया, और पहले पति फिर माँ के दुर्व्यवहार की एक कठिन यात्रा। साथ ही गर्म होता है दर्द और अफवाहों का ऐसा बाज़ार जिसमें न केवल दो दाम्पत्य जीवन बल्कि उनसे जुडे हुए अन्य अनेक जीवन टूट से जाते हैं।

अखबारों में खबरें छपती हैं, नन्दिता अपने घर व ससुराल से सहारा पाती है परंतु प्रीति अपने "पाप" के लिये अपनों से बार-बार दुत्कारी जाती है| बुरी नज़र वाले पडोसी उससे सम्पर्क करने के बेशर्म प्रयास भी करते हैं। आगे क्या होता है, यह विस्तार से कहने से तो शायद अनुरनन का आकर्षण कम हो जाये मगर फिर नन्दिता को राहुल के अंतिम वचन का डिजिटल रिकॉर्डर मिलता है। खोये हुए क्षण और जीवन तो कभी वापस नहीं आते परंतु मृतक पति के अंतिम शब्द उस दुर्घटना के प्रति नन्दिता की सोच को पलट देते हैं। लगभग उसी समय प्रीति आत्महत्या का प्रयास करती है।

प्रीति: "पंछी बनकर उड न पाई, सबने मेरे पंख काटकर रख दिये।"
नन्दिता: "मन के पंख से उड पगली, यह मैं कह रही हूँ तुझसे।"


शनिवार, 9 अप्रैल 2011

मौन रागम (1985) - तमिल फिल्म समीक्षा


हिन्दी फिल्में देखता रहा हूँ, परंतु बीच-बीच में अन्य भाषाओं की फिल्में देखने का अवसर भी मिला है। अंग्रेज़ी और तेलुगु के अतिरिक्त भी कई भाषाओं की फिल्में देखीं हैं। तमिळ में बनी "मौन रागम" एक ऐसी ही फिल्म है। अधिकांश तमिल फिल्मों की तरह नाटकीयता और भावनात्मकता का खूबसूरत संतुलन।

आज तो मणिरत्नम को भारतीय फिल्म जगत अच्छी तरह पहचानता है। 1985 में बनी "मौन रागम" उनकी पहली फिल्म थी। फिल्म का पार्श्व संगीत व गीत-संगीत मेरे प्रिय संगीतकार इल्याराजा का है। संगीत इस फिल्म का एक सशक्त पक्ष है। ऐस. जानकी और ऐस. पी बालासुब्रामण्यम के स्वर अभिनेताओं और संगीत के अनुकूल हैं। "चिन्न चिन्ना" और "निलावे वा" जैसे गीतों से दर्शक सहज ही जुड जाता है। सन 2007 की हिन्दी फिल्म "चीनी कम" के गीत इस फिल्म के संगीत से प्रेरित बताये जाते हैं।

विषय भले ही नया न हो परंतु इस फिल्म की कहानी, निर्देशन, नृत्य फोटोग्राफी आदि सभी अंग सुन्दर हैं। रेवती, मोहन और कार्तिक  मुथुरामन इस फिल्म के मुख्य कलाकार हैं। सहज अभिनय ने इस फिल्म में चार चान्द लगा दिये हैं।
    
कठिन परिस्थितियों में दिव्या को अपनी अच्छा के विरुद्ध चन्द्रकुमार से विवाह करना पडता है। शादी के बाद भी वह न तो अपने मृत प्रेमी को भूल पाती है और न ही वर्तमान सम्बन्ध के प्रति अपनी अनिच्छा दिखाने का कोई अवसर ही छोडती है। मृदुभाषी पति उसके अतीत को भुलाकर वर्तमान को हर सम्भव सुखद बनाता है और इसी प्रयास में एक दिन यह पूछ बैठता है कि वह अपनी पत्नी को ऐसा क्या उपहार दे जिससे वह संतुष्ट हो सकेगी।

"तलाक़", दिव्या कहती है और चन्द्रकुमार अपना कलेज़ा सीकर न केवल उसकी इच्छापूर्ति की प्रक्रिया में लग जाता है बल्कि अब वह आसन्न जुदाई के लिये अपने को तैयार करते हुए स्वयम् भी इस सम्बन्ध से बाहर आने के प्रयास आरम्भ कर देता है। सहमति से तलाक़ की अर्ज़ी दाखिल होती है परंतु नियमों के अनुसार दोनों को एक वर्ष तक साथ रहकर अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने को कहा जाता है।

जैसा कि आप अन्दाज़ लगा सकते हैं कि इस बीच धीरे-धीरे दिव्या अपने पति के शांत व्यवहार के पीछे छिपे व्यक्ति को समझने लगती है परंतु अब समीकरण उल्टे चलने लगते हैं जहाँ पति अपने जीवन से दिव्या की आगत अनुपस्थिति के बाद की तैयारी में लगा है। एक दिन अपने काम पर हुई किसी झडप में जब चन्द्रकुमार घायल हो जाता है, दिव्या अपना कर्तव्य निभाती हुई पहली बार पति की सेवा में लग जाती है।

दिव्या को याद भी नहीं रहता कि साल पूरा होने को है और तलाक़ के निर्णय की तारीख निकट आती जा रही है। दोनों ही अपने दिल की बात अपने तक ही रखते हैं। लेकिन दिव्या इसी बीच अपने प्रेम की मूक अभिव्यक्ति के लिये लिये कुछ ऐसा कर बैठती है जिससे खफा होकर चन्द्रकुमार उसका रेल का टिकट मंगाकर उसे अपने मायके जाने को कहता है। दुखी मन से जब वह स्टेशन पहुंचती है तो चन्द्रकुमार को वहाँ मौजूद पाती है। प्रसन्न्मना पत्नी निकट आती है तो चन्द्रकुमार उसे वादा किया गया उपहार देता है - तलाक़ की स्वीकृति के पत्र। दिव्या अपने हृदय की बात कहकर उन कागज़ों को फाडकर अपनी ट्रेन में चली जाती है।

देखिये इस फिल्म का अंतिम दृश्य यूट्यूब के सौजन्य से। नहीं, "मौन रागम" के लिये आपको तमिळ भाषा जानने की आवश्यकता नहीं है, हाँ आती हो तो बेहतर है।


Mauna Ragam climax scene video clip courtesy: Youtube and original uploader

सोमवार, 7 मार्च 2011

यह साली ज़िन्दगी - फिल्म समीक्षा


यह साली ज़िन्दगी
 सुधीर मिश्र हिन्दी सिनेमा के जाने-माने हस्ताक्षर हैं। 1996 की रोमांचक फिल्म "इस रात की सुबह नहीं" से मशहूर हुए सुधीर मिश्र 1983 की चर्चित फिल्म "जाने भी दो यारों" की कथा और पटकथा के सहलेखक थे, इस बात की जानकारी कम ही लोगों को है। 

 मैं भी "जाने भी दो..." से लेकर "हज़ारों ख्वाहिशें..." तक सुधीर मिश्र का फैन रहा हूँ। लेकिन अब लगता है कि वे अपने ही फॉर्मूले दोहराने के फेर में पड गये हैं। कई पात्रों से अभिनय भी नहीं करा सके थे। फिल्म जगह-जगह पर नकली लगी।

"यह साली ज़िन्दगी" के नाम पर आपत्ति किये जाने पर सुधीर का कहना था कि "साली" कोई गाली नहीं है। फिल्म देखने वालों को पता लग गया होगा कि वाहियात गालियों के मलबे में दबी हुई फिल्म के निर्देशक को "साली" में गाली कैसे नज़र आयेगी। "इस रात की सुबह नहीं" का पुलिस अधिकारी इस फिल्म में भी अपराधियों से मिलकर हत्या सरीखे अपराध बडी तसल्ली से अंज़ाम देता है। "हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी" के नायक की तरह इस फिल्म का नायक भी अपनी मॉडर्न नायिका के लिये अपना स्थापित जीवन दांव पर लगाकर मौत से आंखमिचौनी खेलता हुआ अंततः उसे पाने में कामयाब होता है। कसे निर्देशन के बावज़ूद कहानी का समय में आगे-पीछे डोलते रहना कई बार ऐसी भावना देता है मानो कोई शरारती बच्चा एक बेसुरे भोंपू को बार-बार आपके कान के आगे पीछे कर रहा हो। मंत्री बने अभिनेता से न तो अभिनय हुआ और न ही सम्वाद बोले गये। न जाने सुधीर मिश्र की हर फिल्म में एक ऐसा पात्र क्यों होता है। फिल्म में शुरू से आखिर तक की अधिकांश सिचुएशंस (घटनायें?) भी पूर्णतः अविश्वसनीय हैं और दूर की कौडी लगती हैं।

कुल मिलाकर समय और पैसे की बर्बादी और एक अच्छे निर्देशक से मोहभंग कराने वाली फिल्म।