रविवार, 29 जून 2008

न हन्यते

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।


गीता का यह श्लोक मेरे प्रिय श्लोकों में से एक है। शायद आपने भी सुना होगा। मगर इसके बारे में फ़िर कभी। आज की मेरी पोस्ट इस श्लोक के दो शब्दों "न हन्यते" के बारे में है। कल शाम को प्रज्ञा की कहानी "अपने लिए" पढ़ी तो अनायास ही मैत्रेयी देवी की याद आ गई।

मैत्रेयी देवी १९१४ में कोलकाता के एक संभ्रांत परिवार में जन्मीं। वे कवीन्द्र रबीन्द्रनाथ ठाकुर की शिष्या रहीं। उनके जीवन के सोलहवें वसंत में मिर्चा इलिएड उनके पिता का छात्र बनकर आया। मिर्चा एक रोमानियन था और भारत को बेहतर समझने के लिए मैत्रेयी के पिता से संस्कृत सीखना चाहता था। मिर्चा उनके घर के एक हिस्से में ही रहने लगा। दोनों का बहुत सा समय घर के पुस्तकालय में और बाहर एक साथ गुज़रता था। जल्दी ही दोनों में नजदीकियां बढीं। मैत्रेयी देवी के माँ-बाप की अनदेखी और विश्वास को मिर्चा ने उनकी सहमति समझा और दोनों किशोर अपनी सीमाओं से कुछ आगे निकल गए। सम्पूर्ण प्रकरण की जानकारी होने पर मैत्रेयी के पिता ने मिर्चा को घर से निकाल बहार किया। कभी-कभार मैत्रेयी को उसके तीर्थ-स्थलों में भटकने की जानकारी मिली और बाद में कोई भी ख़बर आनी बंद हो गई।

समय गुजरा, मैत्रेयी की शादी हुयी, बच्चे हुए और वह बंगाल के साहित्य जगत में एक सूर्य की तरह चमकने लगीं। सब कुछ अच्छा ही चल रहा था कि यूरोप भ्रमण कर आए कुछ परिवार जनों व परिचितों से मैत्रेयी को पता लगा कि मिर्चा ने उनके बारे में कोई किताब लिखी है। बाद में पता लगा कि पुस्तक का नाम उनके नाम पर मैत्रेयी रखा था। पुस्तक के फ्रेंच अनुवाद का नाम Les Nuits Bengali अर्थात "बंगाल की रातें" था और उसकी नायिका का नाम था अमृता। अमृता प्रतीक थी उस नायिका की जिसकी संस्कृति अमृत्व (आत्मा की नश्वरता) में विश्वास रखती है।


काफ़ी समय बाद मैत्रेयी को पता लगा कि किताब में उनके बारे में (दरअसल नायिका अमृता के बारे में - परन्तु उपन्यास आत्मकथात्मक है और सत्य व कल्पना का भेद इतना झीना है कि सामान्य पाठक को दिखता ही नहीं है) ऐसा बहुत कुछ है जो कि तत्कालीन भारतीय समाज में अच्छा नहीं समझा जाता। उसके बाद उनकी रातों की नींद उड़ गयी। अंततः जब उनको किताब का अनुवाद जानने को मिला तो उसमें वर्णित घटनाओं का जवाब देने की उनकी इच्छा बहुत बलवती होती गई। उन्होंने पुस्तक के कुछ अंशों के प्रतिकार स्वरुप कुछ कवितायें भी लिखीं।

"न हन्यते" में उन्होंने बहुत खूबसूरती से लिखा है कि किस तरह उनकी जानकारी के बिना ही उनके पति उनके उस दुःख में उनके साथ रात रात भर जगे रहते थे। एक और जगह उन्होंने एक ज्योतिषी से साक्षात्कार के बारे में लिखा है जो उन्हें बताता है कि वे एक प्रेम प्रसंग के चलते विदेश यात्रा पर जाने वाली हैं। वे अपनी ढलती उम्र का हवाला देकर हंसकर बात टालती हैं। बाद में अपने पति के निरंतर प्रोत्साहन पर १९७३ में वे पेरिस जाकर मिर्चा से मिलकर आयीं और १९७४ में "न हन्यते" प्रकाशित हुयी।

"न हन्यते" में १९३० से लेकर १९७३ तक की उथल पुथल का बहुत ही मार्मिक वर्णन है। मैंने तो आज से पचीस साल पहले इसका हिन्दी अनुवाद ही पढ़ा था परन्तु उस एक अनुवाद ने ही लेखिका के प्रति असीम श्रध्दा पैदा कर दी। मिर्चा के साथ ४३ साल बाद हो रही बहु-प्रतीक्षित मुलाकात का इतना सुंदर परन्तु दिल चीर देने वाला वर्णन है कि मैं उसको शब्दों में बयां कर नहीं सकता। उसकी गहराई को महसूस करने के लिए उसे आपको स्वयं ही पढ़ना पड़ेगा। "न हन्यते" उस सच्चाई को पूरा करती है जिसे "Les Nuits Bengali" ने चिंगारी दी थी। दोनों ही पुस्तकों में तत्कालीन भारतीय समाज का सजीव वर्णन है। परन्तु "न हन्यते" किसी टाइम मशीन की तरह काल में आगे पीछे घूमती रहती है.

१९९० में ७६ वर्ष की आयु में मैत्रेयी ने इस संसार से विदा ली। उनकी मृत्यु के कुछ समय बाद ही रूपा प्रकाशन ने "Les Nuits Bengali" का पहला अंग्रेज़ी अनुवाद भारत में प्रकाशित किया। यह अनायास नहीं था। मिर्चा का वादा था कि उस किताब का अंग्रेज़ी या भारतीय भाषा संस्करण (उनके रहते हुए) नहीं आएगा। अलबत्ता "Les Nuits Bengali" पर एक फ्रेंच फ़िल्म मैत्रेयी देवी के जीवन काल में ही बनी जिसमें शबाना आज़मी ने मुख्य भूमिका निभायी थी।

जिन्होंने "न हन्यते" पढ़ा है वे तुंरत ही पहचान गए होंगे की संजय लीला भंसाली ने 1999 में बनी हिन्दी फ़िल्म "हम दिल दे चुके सनम" की कहानी कहाँ से उड़ाई है। बॉलीवुड की नाशुक्री परम्परा को निभाते हुए फ़िल्म में कहीं भी मैत्रेयी देवी के नाम का उल्लेख नहीं है। लेकिन फ़िल्म उतनी अच्छी बन भी नहीं सकी जितना कि मूल उपन्यास था।

10 टिप्‍पणियां:

  1. amazing!!!
    sach mein aise pati hote hain??? salute to that soul....
    wakai mein kahani ke baare mein padh kar hi lag raha hai ki film kuchh nahi ban paayee...
    aur saath hi upanyaas padhne ki ichchha jaag uthi...

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  2. प्रज्ञा,

    जो ऐसे होते हैं वो ऐसे होते ही हैं, पति, या पिता बनने के बाद भी वैसे ही रहते हैं. मेरे पास दोनों किताबें हैं. यदि आप पढ़ना चाहें तो borrow कर सकती हैं.

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  3. "न हन्यते" का आपने बड़ा ही मार्मिक सार लिखा है ! आपकी पकड़ भाषा पर बड़ी जोरदार है ! अंत में आपने संजय लीला भंसाली के नाशुक्रे पन की बात कही सो भाई साहब भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री में तो ये उसूल है की "दुसरे की मौत अपनी जिन्दगी है " फ़िर कहाँ आप इनसे ऎसी शालीनता की आशा लगा बैठे ?
    सही में आपके ब्लॉग पर बहुत ही मज़ा आया ! और ज्ञान वर्धन के लिए आते रहना पडेगा !
    शुभकामनाएं !

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  4. bata sakte hai ki es upanyas ka Hindi anuwad kahan se prakashit hua aur kaise mil sakta hai...?
    Dhanyawad

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  5. सुकेश श्रीवास्तव जी,
    न हन्यते के हिन्दी संस्करण का विवरण इस प्रकार है:
    ISBN: ८१-७११९-२९६-३
    अनुवादक: विमल मिश्र
    प्रकाशक: राधाकृष्ण प्रकाशन
    २/३८ अंसारी मार्ग,
    दरयागंज, नई दिल्ली - 110002.

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  6. "न हयन्ते" पढ़ा काफी अच्छा लिखा है आपने।

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  7. please don't blame on sanjay leela bhansaali. as he had declared that he is going to make a remake of movie ' woh saat din' with some changes.....i have not read na hanyate but you should please watch the movie wo saat din and should transfer the blame to wo saat din instead of ham dil de chuke sanam.......thanks and regards.

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  8. अभी तक हमने "न हन्यते" नहीं पढ़ा पर काफी कुछ सुना है और मेरे एक अपने ने कहा है पढने के लिए ....

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  9. अभी तक हमने "न हन्यते" नहीं पढ़ा पर काफी कुछ सुना है और मेरे एक परचित ने कहा है पढने के लिए .....

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